Friday, May 4, 2018

कितना 'बेचारा' है पत्रकार ?

लोकतंत्र के संरक्षण और संवर्धन में पत्रकार की क्या भूमिका हो सकती है? अब ये बहस का मुद्दा बन गया है। पत्रकारिता की आजादी को लेकर हमेशा संविधान के अनुच्छेद 19 (1) का हवाला दिया जाता है और कहा जाता है कि पत्रकार को सूचना पाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। लेकिन जमीनी तौर पर देखें तो हकीकत कुछ और है। किसी खबर को पाने के लिए पत्रकार को 'चमचा' बनना पड़ता है। तब जाकर उसे सूचना मिलती है। ऐसे कई मामले देखने में आए हैं जब पत्रकार 'चमचा' नहीं बनता है तो उसे परिसर से धक्के मार कर बाहर निकाल दिया जाता है। झूठे मुकदमे में फंसा दिया जाता है। पत्रकारों के साथ मारपीट की जाती है। उनकी हत्या कर दी जाती है। कम से कम खोजी पत्रकारिता में ऐसा देखा जाता है कि पत्रकार के पास जांच अधिकारी की तरह कोई पावर तो होता नहीं है। ऐसे में वो पत्रकार किस तरह से अपनी खोजी पत्रकारिता की काबिलियत का इस्तेमाल कर पुख्ता खबर निकालता है। ये अकाट्य सच है कि कोई भी अपराधी अपने अपराध के बारे में पत्रकार को भनक भी नहीं लगने देगा। रिपोर्टर बाइट और बयान लेने के लिए पीछे-पीछे दौड़ते रहते हैं, लेकिन सामने वाला शख्स पत्रकारों को धकिया कर आगे निकल जाता है और पत्रकार बेचारे...बेचारे बनकर रह जाते हैं। ऐसे  में बड़ा सवाल यही है कि भारत में पत्रकारिता किस स्तर की है। खबर के लिए सूत्र पत्रकार का बहुत बेहतर जरिया होता है, लेकिन यदि वो सूत्र किसी दबाव में आकर खबर की जानकारी नहीं दे तो फिर कोई पत्रकार खबर नहीं निकाल पाएगा। पत्रकार के पास ऐसा कोई कानूनी अधिकार मौजूद नहीं है जिसके दम पर वो सूचना पा सकें। हार्ड न्यूज के लिए न तो RTI 2005 काम आएगा और न ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला। ऐसे में पत्रकारिता को उन्नत बनाने के लिए सरकार को आगे आना होगा। वरना दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पत्रकारिता का स्तर ऐसे ही गिरता चला जाएगा। श्रमजीवी पत्रकारों की स्थिति दयनीय है। सरकार को पत्रकारों की लाचारी समझनी चाहिए। उनके कवरेज की सीमा पर फिर से विचार करने की जरूरत है। तीसरे प्रेस आयोग की मांग इसलिए ही की जा रही है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक सभी के लिए एक ऐसी आचार संहिता और अधिकार तय किए जाएं जिससे पत्रकारिता का स्तर ऊंचा उठ सके। 



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