Thursday, May 3, 2018

कितना स्वतंत्र है मीडिया ?

3 मई को हर साल विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। विश्व के कई देशों के साथ भारत में भी ये सवाल उठता रहा है कि आखिर भारत में प्रेस कितना स्वतंत्र है? 1975 में आपातकाल की कालिख को हटा कर बात करें तो लोकतंत्र के इस चौथे खंबे को सरकार ने कितना मजबूत बनाया है? ये सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यापालिका, लोकतंत्र के ये तीनों स्तंभ प्रेस की आजादी का दावा करते हैं, इसके साथ ही ये मीडिया पर अपनी आजादी का दुरुपयोग करने का आरोप भी लगाते हैं। यही वजह है कि मीडिया की आजादी को सीमित करने के लिए कुछ ऐसे कानून भी मौजूद हैं जिन पर अलग से चर्चा की जा सकती है। गौरतलब है कि संविधान में अनुच्छेद 19 (1) (A) के तहत भारतीय नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। इस अनुच्छेद में प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है। हालांकि इस अनुच्छेद में ्प्रेस की स्वतंत्रता की कहीं स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई है, सिर्फ अदालतों के फैसलों के आधार पर प्रेस की स्वतंत्रता को अनुच्छेद 19 (1) क में निहित किया गया है। लेकिन ये स्वतंत्रता असीमित नहीं है। संविधान में कुछ बंधन भी लगाए गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में ये प्रावधान किया गया है कि देश की एकता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों पर असर डालने वाली अभिव्यक्ति, अपराध के लिए किसी को उत्तेजित करना और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका की हालत में प्रेस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
स्वतंत्रता के पहले प्रेस एक मिशन के तहत कार्य कर रहा था, लेकिन आजादी के बाद प्रेस का मिशन व्यावसायिकता में बदल गया। लोकतंत्र के इस चौथे खंबे को कॉरपोरेट जगत ने इतना जकड़ लिया है कि अब पत्रकारिता का दम घुटने लगा है। ऐसा नहीं है कि सरकार ने प्रेस की स्वतंत्रता और उन्नयन के लिए कार्य नहीं किया। सरकार ने सितंबर 1952 में पहले प्रेस आयोग का गठन किया। जिसकी अध्यक्षता जस्टिस जी एस राजाध्यक्षा ने की। उनके साथ 10 विद्वानों को भी आयोग का सदस्य बनाया गया। इनमें मीडिया जगत से जुड़े लोग भी शामिल थे। इस आयोग की अनुशंसा पर सरकार ने रजिस्टार ऑफ न्यूजपेपर्स ऑफ इंडिया की स्थापना, प्रेस कॉन्सिल ऑफ इंडिया का गठन किया। इस आयोग ने सरकार से पत्रकारों के लिए वेजबोर्ड गठित करने की भी सिफारिश की। इसके बाद 29 मई 1978 को पी के गोस्वामी की अध्यक्षता में दूसरे प्रेस आयोग का गठन किया गया। लेकिन जनता सरकार के गिरने के बाद इस आयोग को भंग कर दिया गया। कांग्रेस की नई सरकार ने जनवरी 1980 में जस्टिस के के मैथ्यू की अध्यक्षता में दूसरे प्रेस आयोग का गठन किया। आयोग का मानना था कि प्रेस को सरकार और जनता के बीच संवाद के लिए सेतु का काम करना चाहिए। इस आयोग ने न्यूजपेपर डेवलपमेंट कमीशन के गठन की सिफारिश की। आयोग ने प्राइस-पेज शेड्यूल पर बल दिया। आयोग ने सरकार को विज्ञापन नीति बनाने की भी सिफारिश की। तब अखबार का जमाना था, इसलिए पीसीआई के दायरे में सिर्फ प्रिंट मीडिया ही आया। अब चूंकि जमाना बदल गया है और टेक्नोलॉजी के इस युग में टेलीविजन, रेडियो और वेब पत्रकारिता होने लगी है ऐसे में प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया के दायरे को बढ़ाना जरूरी हो गया है। हालांकि न्यूज ब्रॉडकास्टर आत्मनियंत्रण पर बल दे रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया तो बेलगाम है। ऐसे में मीडिया की स्थिति को देखते हुए तीसरे प्रेस आयोग की मांग जोर पकड़ने लगी है। मगर सरकार है कि इस मांग पर विचार करने को तैयार नहीं है जिसका असर ये है कि मीडिया व्यावसायियों के चंगुल से बाहर नहीं निकल पा रहा है। व्यावसायिकरण के इस दौर में पत्रकारों का जमकर शोषण हो रहा है। भारत में अब तक न जाने कितने पत्रकारों की हत्या कर दी गई। पत्रकारों को धमकी और प्रताड़ना तो आम बात है। पत्रकारों ने अपनी सुरक्षा के लिए सरकार से कानून की मांग की, लेकिन सरकार ने इस मांग को भी अनसुना कर दिया।  कहने के लिए भारत में मीडिया स्वतंत्र है, लेकिन हकीकत यही है कि श्रमजीवी पत्रकार बदहाल सिस्टम का शिकार होकर दम तोड़ रहा है और मीडिया घराने के मालिक और राजनीतिक दल अपने-अपने हितों को साधने के लिए एक-दूसरे के साथ अघोषित गठबंधन करके बैठे हैं। प्रेस की आजादी के लिए इस अघोषित गठबंधन को तोड़ना होगा, लेकिन इसके लिए कौन आवाज उठाए। इसको लेकर खुद पत्रकारों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जो पत्रकार अपने लिए आवाज नहीं बुलंद कर पा रहा है तो दूसरों के लिए क्या आवाज उठाएगा?

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