Thursday, May 10, 2018

लोकतंत्र की जड़ में महाभियोग का रोग !

8 मई 2018 को संविधान पीठ ने महाभियोग को लेकर दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया। दरअसल राज्यसभा के 60 सांसदों ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया था। ये नोटिस उन्होंने सभापति एम वेंकैया नायडू को सौंपा था, लेकिन सभापति ने इस नोटिस को ये कहते हुए खारिज कर दिया कि इसमें लगाए गए आरोपों में कोई दम नहीं  है। इसके बाद सभापति के इस फैसले को कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। जहां इस मामले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दिया गया। जहां सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। यहां बड़ी अजीब स्थिति पैदा हो गई है। देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सदन से लेकर अदालत तक महाभियोग का ब्रह्मास्त्र छोड़ा जा रहा है। जस्टिस दीपक मिश्रा को लेकर जिस तरह से सियासत हो रही है वो अपने आप में काफी शर्मनाक है। कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सरकार ने नेशनल ज्यूडिशियल अपवाइंटमेंट कमीशन की स्थापना की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आयोग की पुनर्विलोकन करने के बाद इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता में बाधक माना। जाहिर है लोकतंत्र के चार खंबों में न्यायापालिका की स्वतंत्रता और गरिमा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। ऐसे में कांग्रेस के कदम की आलोचना की जाएगी जिसकी वजह से लोकतंत्र के इस स्तंभ पर  सवाल खड़े किए जा रहे  हैं।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति कलोजियम पद्धति से होती है। जिसमें मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। विभिन्न राजनीति दल इस कलोजियम पद्धति की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। ये पहला मौका नहीं है जब मुख्य न्यायाधीश को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इसके पहले वरिष्ठता की व्यवस्था को नजरअंदाज करके ए एन राय को मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। 1977 में फिर वरिष्ठता की व्यवस्था को नजरअंदाज कर एम यूत बेग को चीफ जस्टिस बनाया गया। अब बात करते हैं न्यायाधीशों को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया पर। राष्ट्रपति न्यायाधीश को साबित कदाचार के आधार पर हटा सकता है। इसके लिए न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 बनाया गया। जिसमें प्रस्ताव पर लोकसभा के 100 सांसदों या राज्यसभा के 50 सांसदों के दस्तखत करने जरूरी है। इसके बाद इस प्रस्ताव को लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के सभापति को सौंप दिया जाता है। स्पीकर या सभापति की सहमति के बाद ही महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो आरोपों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी बनाई जाती है। जांच में यदि न्यायाधीश दोषी पाया जाता है तो उसके विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव दो-तिहाई मतों से पास किया जाता है। इसके बाद दोषी न्यायाधीश को उसके पद से हटा दिया जाता है। आइए अब आपको बताते हैं कि किन-किन न्यायाधीशों के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया। सुुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस बी रामास्वामी के विरुद्ध 1991 में महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया, लेकिन कांग्रेस के मतदान में भाग नहीं लेने के कारण ये प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। इसी तरह 29 जुलाई 2011 को सिक्किम उच्च न्यायालय के जज जस्टिस पी डी दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया, लेकिन इस दौरान पी डी दिनाकरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं कलकता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन के विरुद्ध अगस्त 2011 में राज्यसभा में महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया, लेकिन 5 सितंबर को लोकसभा में इस प्रस्ताव के पारित होने के पहले ही सौमित्र सेन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। बहरहाल जस्टिस दीपक मिश्रा को लेकर जो विवाद था, उसको लेकर जिस तरीके से कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, उसे उसी तरीके से अपनी याचिका वापस लेनी पड़ी।जाहिर सी बात है कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग लाने का प्रस्ताव देकर एक तो कांग्रेस ने न्यायापालिका की गरिमा के साथ समझौता किया वहीं पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कांग्रेस की याचिका को खारिज कर न्यायापालिका की गरिमा को बरकरार रखने की कोशिश की है। वैसे जिस दिन सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था, उससे न्यायापालिका की विश्वसनीयता घटी थी। इस महाभियोग के पारित होने पर न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगता। मुख्य न्यायाधीश का पद उच्च गरिमा वाला पद है ऐसे में गंभीर आरोपों के आधार पर ही महाभियोग का प्रस्ताव देना चाहिए। वरना जिस तरह से लोगों का नेताओं पर से भरोसा उठ गया है ठीक उसी तरह जनता का जजों के ऊपर से विश्वास उठ जाएगा। 

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