Tuesday, May 1, 2018

मजदूर दिवस: कर्म की पूजा का दिन

देश के मजदूरों जागो, अपने हक के लिए लड़ो। जब तक जीत न मिले तब तक संघर्ष करो। ये चंद लाइन उस श्रमिक वर्ग को प्रेरणा देती है जो शोषण और प्रताड़ना का विरोध करना सीखें। औद्योगिक क्रांति के बाद वामपंथ विचारधारा से जुड़े लोगों को ही मजदूर माना जाता रहा है। वामपंथी आंदोलन ने मजदूरों को उनका वाजिब हक दिलाने के लिए फैक्ट्रियों में ताले लगाए तो वहीं जमींदारों की जमीन पर लाल झंडा गाड़ दिया। ऐसे में लगा कि भारत में वामपंथ श्रमिक वर्ग के कल्याण का बहुत बड़ा जरिया बन कर उभरेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वामपंथ या तो चरमपंथ में बदल गया या फिर लोकतंत्र के मंदिर में खुद को स्थापित करने के लिए सर्वहारा वर्ग की तलाश करने लगा। उसने मजदूरों और किसानों को संगठित करने की कोशिश की। लेकिन यहां भारतीय समाज में दिक्कत ये है कि चाहे वो वामपंथ हो या फिर दक्षिणपंथ दल, सबने किसान के नाम पर खेतों में काम करने वाले उन मजदूरों के हितों को नजरअंदाज कर दिया जिसकी बुनियाद पर वामपंथ समाज में भारी बदलाव ला सकता था। मगर उसने उस रेखा को नहीं  पहचाना जिसकी समझ से एक सफल सामाजिक क्रांति का शंखनाद किया जा सकता था। किसान के खेतों में काम करने वाले मजदूर और किसानों को आप एक ही पलड़े पर नहीं तौल सकते। टेक्नोलॉजी के बदलते इस युग में समाज का एक शिक्षित वर्ग भी है जो खुद को मजदूर घोषित करता है। तमाम प्राइवेट और सार्वजनिक कंपनियां हैं जहां करोड़ों  लोग नौकरी कर रहे हैं। ये खुद को मजदूर मानते हैं। टेबल पर बैठक कलम चलाने वाला या की-बोर्ड पर ऊंगलियां फिराने वाला भी खुद को मजदूर मानता है। ऐसे में मजदूर का दायरा कितना फैला हुआ है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। ऐसे में समाजवाद की बात करना जरूरी हो जाता है, क्योंकि भारत में ये विचाराधारा वामपंथ के मुकाबले ज्यादा सफल रही है। जिस तेजी के साथ समाज में बदलाव आए हैं उसको देखते हुए ये कहना वाजिब होगा कि पूंजीवाद की छतरी में मजदूर सुस्ता रहा है। उसे मालूम है कि उसके हितों और संघर्ष को नई दिशा देने वाला कोई नहीं है। लिहाजा इस वर्ग में ये सोच विकसित हो गई है कि कर्म ही पूजा है। पूजा करते रहिए, भले ही उस पूजा का वाजिब फल मिले न मिले। मजदूर दिवस दुनिया के सारे मजदूरों के जागरूक होने का प्रमाण साबित हो सकता है बशर्ते मजदूरों को अपने अधिकारों का पता हो। 

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