Wednesday, April 18, 2018

कौन रोकेगा जाति का जहर ?

भारतीय राजनीति की जड़ में जातिवाद का जहर इस तरह घुल गया है कि उसे जड़ से मिटाना अभी संभव नहीं दिख रहा है। बीजेपी नीत मोदी सरकार दलितों को रिझाने के लिए अध्यादेश लाने की तैयारी में है तो वहीं वो सवर्ण वोटबैंक को भी नाराज नहीं करना चाहती। 2 अप्रैल 2018 को दलितों ने एससी-एसटी एक्ट के पक्ष  में भारत बंद कराया था जिसमें 7 लोगों की मौत हो गई। आंदोलन की आग में लोजपा से लेकर राजद तक और कम्यूनिस्ट पार्टी से लेकर बसपा तक सभी ने अपनी सियासी रोटी सेंकनी शुरू कर दी। इस बीच एक तबका वो भी निकला जो सोशल मीडिया का सहारा लेकर पूरा भारत बंद करा दिया। इस तथाकथित वर्ग ने एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ में बंद का आह्वान किया था। लेकिन इऩ दोनों आंदोलनों के अंदरखाने को टटोलने की कोशिश की जाए तो उसमें मामला कुछ और निकलता है। एससी-एसटी एक्ट के बहाने दलित समाज अपने उस विकास के हथियार की सुरक्षा में लगा रहा जिसको लेकर वो सदा सशंकित रहता है। वहीं इस एक्ट के खिलाफ गैर दलित तो पहले से ही विरोध में है। लेकिन असल मुद्दा जाति को आरक्षण का कवच पहनाने और बचाने का है। यदि दलित समाज की मनोदशा को टटोलने की कोशिश की जाए तो उसे इस बात का डर हमेशा रहता है कि कहीं उसके हाथ से आरक्षण की सुविधा न छीन ली जाए। वहीं जनरल कैटेगरी के लोग लगातार आरक्षण समाप्त करने की वकालत करते आए हैं। चाहे 2 अप्रैल का बंद हो या फिर 10 अप्रैल की बंदी। कुल मिलाकर आरक्षण को लेकर आरपार की लड़ाई लड़ने के लिए दोनों वर्ग सड़क पर उतरने लगे हैं। जिस वैश्वीकरण के दौर से भारत गुजर रहा है और जिस तरह से देश के हालात बदलते जा रहे हैं उसको देखते हुए आरक्षण की सुविधा की समीक्षा यदि की जाती है तो उस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर ये समझना जरूरी है कि दलित नेता रामविलास पासवान के साथ बैठने और खाने-पीने से सवर्ण समाज क्या भेदभाव करेगा? क्या यहां छुआछूत की भावना प्रबल हो सकती है। यदि ईमानदारी से कहा जाए तो रामविलास पासवान के साथ भेदभाव का कोई घटना घट नहीं सकती। हां गरीबी एक ऐसा अभिशाप है जिसकी जद में आकर दलित से लेकर मुसलमान तक, सभी का दम घुट रहा है। फिलहाल 14 अप्रैल को बाबा साहब अंबेडकर की जयंती मनाने लोजपा नेता रामविलास पासवान से लेकर राजद के नेता तेजस्वी यादव भी गांधी मैदान पहुंचे और बाबा साहब को श्रद्धांजलि दी। सत्ता पक्ष का दलित चेहरा जहां रामविलास पासवान बने तो वहीं तेजस्वी यादव भी खुद को दलितों का शुभचिंतक घोषित किया। सरकारी कार्यक्रम के तहत राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने भी बाबा साहेब अंबेडकर को याद किया। बाबा साहब अंबेडकर के बहाने दलितों का दिल जीतने की कवायद के बाद अब 22 अप्रैल को बीर बाबू कुंवर सिंह की जयंती मनाकर बीजेपी अपनी राजपूत वोटबैंक को सुरक्षित करना चाहती है।  22 अप्रैल के कार्यक्रम में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी शिरकत करेंगे। वहीं स्वर्गीय चंद्रशेखर को श्रद्धांजलि देकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी राजपूत वोटबैंक को साधने की कोशिश की  है। कुल मिलाकर तस्वीर जो उभर कर सामने आ रही है उसे देखकर बस यही कहा जा सकता है कि जाति का जहर कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। 

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