Thursday, March 8, 2018

म्यूजियम की दीवार का दर्द

दरअसल ये तस्वीर उस इमारत की चाहरदीवारी की है जिसे सभी पटना म्यूजियम या संग्राहलय के तौर पर
जानते हैं। जाहिर है संग्रहालय है तो अंदर का दृश्य लुभावना और मनमोहक तो होगा ही। म्यूजियम में कई ऐसी वस्तुएं हैं जिन्हें सभी को देखना चाहिए। यदि आप उन वस्तुओं को देखना चाहते हैं तो महज 15 रुपए का टिकट खरीदिए और घूम लीजिए म्यूजियम का कोना-कोना। यदि आप म्यूजियम की दीवारों से रू-ब-रू होंगे तो आपको लगेगा कि दीवारों पर जैसे पोस्टर फाड़ एक्शन का भेड़चाल दिख रहा है। पोस्टर में चाहे कोचिंग क्लास का विज्ञापन हो या फिर किसी नीम हकीम का जादूभरा इलाज या फिर किसी राजनीतिक दलों के वो पोस्टर जो एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में लगे रहते हैं। यही वजह वजह है कि जब आप बिहार के किसी भी जिले में जाएंगे तो दीवारों पर इस तरह के पोस्टर चिपके और फाड़े हुए मिलेंगे। हालांकि इन दीवारों पर पोस्टर चिपकाने वालों के अपने अलग तर्क हैं। उनका मानना है कि इससे उनकी सेवाओं और वस्तुओं को विज्ञापन तो होता ही है। साथ ही पोस्टर्स से संबंधित व्यक्तियों में जागरूकता आती है और दीवार की नीरसता समाप्त हो जाती है। मगर यहां सवाल उस दीवार की खूबसूरती की है जिसे इन पोस्टर्स ने गंदा कर रखा है। स्वच्छता अभियान के बीच इस तरह के पोस्टर्स पर भी रोक लगनी चाहिए ताकि दर्शक अंदर की स्वच्छता देख कर निकले तो बाहर की बदसूरती उसे निराश न कर दे। 

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