Wednesday, March 7, 2018

'विकास' के बीच लेनिन का दमन

15 अगस्त 1947 के बाद हिन्दुस्तान कई विचारधाराओं की सुरंग से गुजर कर विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। इस समय केंद्र में भगवा या यूं कहें हिन्दुत्व की विचारधारा के बीच देश के विकास का दावा किया जा रहा है। मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया ऐसे कई उदाहरण है जिन्हें मोदी सरकार विकास के लिए गिनाती है। मई 2014 में बीजेपी जानती थी कि जनता बदलाव चाहती है। लिहाजा उसका फायदा हिन्दुत्व की विचारधारा को मिला। इस बीच पूर्वोत्तर में भाजपा को सीटें मिलना निश्चय ही ये संदेश देने के लिए काफी है कि अब पूर्वोत्तर भी बदलाव चाहता है। वामपंथ की धारा में बह कर पूर्वोत्तर का विकास एक जगह किनारे ठिठक सा गया था। अब जब त्रिपुरा समेत कई राज्यों में भगवा पसरा है तो इन प्रदेशों के लोगों को उम्मीद बंधी है कि उनके इलाके का विकास होगा। उन्हें वो तमाम सुविधाएं दी जाएंगी जिनकी उन्हें दरकार है। त्रिपुरा में वामपंथ से भगवा की हो हुए झुकाव का असली मकसद समझना होगा। वामपंथ के प्रति अविश्वास और नरेंद्र मोदी के प्रति विश्वास, ये बदलाव का साफ संकेत है। लेकिन इस संकेत के बीच यदि विचारधारा का दमन करने की कोशिशें तेज हो जाएं तो फिर बदलाव की सार्थकता पर सवाल खड़े हो जाएंगे। जरा सोचिए, हम उस मुल्क में रहते हैं जो दोस्त तो दोस्त, दुश्मन का भी सम्मान करता है। ऐसे में विचारधारा पर बुलडोजर चलाना किस विकसित मानसिकता का परिचय देता है? कहीं ये सदियों की कुंठा तो नहीं है। रूस में साम्यवाद के नायक ब्लादीमीर लेनिन की मूर्ति को तोड़ना कौन सी जीत का परचम है? यहां बड़ा सवाल यही है कि क्या लेनिन की मूर्ति को तोड़ देने से वामपंथ की विचारधारा दम तोड़ देगी? क्या सिर्फ मूर्तियां तोड़ देने भर से वामपंथ को कुचल दिया जाएगा? यदि ऐसा है तो फिर उन मुस्लिम शासकों को याद करना होगा जिन्होंने भारत में न जाने कितनी मूर्तियों को तोड़ा है। लेकिन उन मूर्तियों को तोड़ने का असर कितना हुआ? भारत में आज भी हिन्दु बहुसंख्यक हैं और वर्तमान में हिन्दुत्व की विचारधारा सत्ता के शीर्ष पर काबिज है। पूर्वोत्तर में हिन्दुत्व का परचम जिस  तरह से लहलहा रहा है वो हैरान करने वाला है। इन इलाकों में अच्छी खासी आबादी ईसाई धर्म को मानने वालों की है। लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने धर्म और विचारधारा से ऊपर उठकर विकास के लिए बीजेपी पर भरोसा जताया है। ऐसे में बीजेपी मूर्तियों को तोड़ने की जगह विकास की अनमोल मूर्तियां खड़ी करने की कोशिश करें तो पूर्वोत्तर भी तमाम सवालों का जवाब सकारात्मक तरीके से देगा। 

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