Monday, March 5, 2018

वह जंगल है चंपारण

नित्य होता है अपहरण ।
नारी का होता चीरहरण ।
भाई-भाई में होता रण ।
वह जंगल है चंपारण ।।

निर्धन का होता शोषण।
होता निशाचर का पोषण ।
न्याय का नहीं है स्मरण ।
वह जंगल है चंपारण ।।

भूख से जहां होता मरण ।
कहां पर ले जनता शरण ।
जहां पड़ चुके हैं हिंसा के चरण ।
वह जंगल है चंपारण ।।

                            (30 अगस्त 1997 को नरम गरम पाक्षिक पत्र में प्रकाशित)

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