Wednesday, March 14, 2018

विश्वविद्यालय की सुविधा बनी 'असुविधा'

जब सिस्टम से लापरवाही का तार जुड़ जाए तो किसी भी संस्थान की साख पर बट्टा लग जाता है। दरअसल
हम बात कर रहे हैं उस अंतरराष्ट्रीय संस्थान की जो भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित है। हिन्दी के विकास को लेकर केंद्रीय सरकार ने इस संस्थान की स्थापना की है। सेवाग्राम के पास वर्धा में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की स्मृति में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। विश्वविद्यालय की स्थापना सन 1997 में की गई है। इस विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल है। इस विश्वविद्यालय का कैंपस देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार ने इस विश्वविद्यालय के उन्नयन पर काफी खर्च किया है। इस यूनिवर्सिटी में कई तरह के कोर्स संचालित हैं। विश्वविद्यालय में छात्र और छात्राओं के रहने के लिए अलग-अलग हॉस्टल हैं। यहां मेस की भी सुविधा है। इसके बीच एडमिशन को लेकर जानकारी हासिल करने के लिए टोल फ्री नंबर का भी इंतजाम किया गया है। लेकिन इस ट्रोल फ्री नंबर पर जानकारी के  लिए जब फोन किया जाता है तो विश्वविद्यालय की तरफ से फोन को कोई भी स्टाफ रिसीव नहीं करता। अब ये समझ से परे हैं कि यदि इस व्यवस्था के लिए जब कोई स्टाफ नहीं था तो ये सुविधा क्यों शुरू की गई ? और जब इसके लिए स्टाफ नियुक्त है तो फिर वो फोन रिसीव क्यों नहीं कर रहा ? इसका जवाब विश्वविद्यालय प्रबंधन को देना चाहिए। अहम बात तो ये है कि प्रबंधन को देखना चाहिए कि उसके द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सुविधा में कहीं लापरवाही तो नहीं बरती जा रही। क्या विश्वविद्यालय इस लापरवाही पर संज्ञान लेगा और क्या इस असुविधा को सुविधा में बदलेगा ?

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