Monday, March 12, 2018

लोकतंत्र के मंदिर में हंगामा क्यों ?

संसद में हंगामे को देखकर दुष्यंत कुमार की एक कविता की कुछ लाइन याद आ  गई। हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, बस सूरत बदलनी चाहिए। लोकतंत्र के एक खंबे पर चढ़कर कुछ लोग इतना हंगामा करते हैं कि धन और वक्त हंगामे की भेंट चढ़ जाता है। हंगामा कर विरोध जताने वाले सांसदों के अपने तर्क हो सकते हैं। उपर्युक्त कथन भले दुष्यंत कुमार का है, लेकिन ये हंगामेदार सांसद इस वाक्य को ढाल बनाकर अपने हंगामे को जायज ठहरा लेते हैं और बेचारी जनता तमाशबीन बन कर रह जाती है। एक अनुमान के मुताबिक संसद के एक मिनट की कार्यवाही पर लगभग तीन लाख रुपए खर्च हो जाते हैं। ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जनता की मेहनत की कमाई को हंगामा करने वाले सांसद किस तरह पानी में बहा देते हैं। माना लोकतंत्र में विरोध एक मजबूत दबाव का काम करता है। लेकिन इतना भी दबाव बनाना ठीक नहीं जिससे सरकार को संसद के खर्च के लिए जनता की जेब काटनी पड़े। संसद में अपनी बात शालीनता से भी रखी जा सकती है। उस पर सरकार जवाब देगी। यदि सरकार इस मामले में लापरवाही बरतती है तो जनता का पैसा बर्बाद करने को दोष उस पर भी मढ़ा जाएगा। लेकिन यहां सवाल नीयत का है। अब किसकी नीयत में खोट है इसका पता लगा पाना मुश्किल होगा, लेकिन जो हंगामा करने वाले लोग हैं उनको लगता है कि जब तक वो हंगामा नहीं करेंगे तब तक वो बड़े नेता नहीं बनेंगे। जब से संसद के दोनों सदनों का टेलीविजन पर सीधा प्रसारण शुरू हुआ है। हंगामे की सूरत काफी बदल गई है। अब हर नेता खुद को जनता का हितैषी बताने के लिए कैमरे के आगे हंगामा करता है जिसका नतीजा होता है कि संसद की कार्यवाही बाधित होती है। हालांकि इस मामले में मीडिया  भी कम दोषी नहीं है। मीडिया को चाहिए  कि वो हंगामा करने वाले नेताओं को कवरेज से बाहर करें, फिर देखिए कैसे सदन के अंदर शालीनता के बीच कार्यवा्ही चलती है? चाहे आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात हो या फिर पीएनबी घोटाला। इन सभी िमसलों पर शांतिपूर्वक चर्चा की जा सकती है और सरकार से जवाब के साथ कार्रवाई की मांग की जा सकती है। 

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