Saturday, February 24, 2018

मजदूरी तो दिला दो सरकार

हम तो मजदूर हैं। हर गम से दूर हैं। ये कहना अपने मुंह पर तमाचा मारने जैसा है। बल्कि हकीकत यही है कि हम मजदूर हैं और सारे गम हमारे पास हैं। सरकार ढोल पीटती है कि वो मजदूरों के कल्याण के लिए कई तरह के कानून बनाकर रखे हुए है। मगर सरकार को पता है या नहीं है, लेकिन यही हकीकत है कि उन तथाकथित कल्याणकारी कानून और योजनाओं का लाभ मजदूरों को नहीं मिल पाता। जिसका नतीजा होता है कि मजदूर और उसका परिवार कई रात बिना भोजन के गुजारता है। इस देश में जो भी श्रम शक्ति है उसका दोहन तो खूब होता है, लेकिन जब पारिश्रमिक देने की बारी है तो कई बहाने पैदा हो जाते हैं और मजदूर तो जिंदा रहता है लेकिन उसकी मजदूरी मर जाती है। चाहे ईंटा ढोने वाला मजदूर हो या फिर कलम चलाने वाला शख्स। सबकी यही कहानी है। शासन और प्रशासन के सामने हाथ जोड़ने के बाद भी उम्मीद के धागों को तोड़ दिया जाता है। केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय से लेकर राज्य के श्रम विभाग तक का यही हाल है। मंत्री भी हैं और अधिकारी भी, लेकिन सब अपना हित साधने में लगे हैं। ये हित क्या हो सकता है ये बहस का अलग मुद्दा है? लेकिन सवाल यही है कि आखिर इतनी बड़ी मशीनरी होने के बावजूद मजदूर बेबस और लाचार क्यों है? उसकी मेहनत का फल उसे क्यों नहीं मिलता? सरकार से पूछो तो सरकार कहती है अजी हमने इतने सारे कल्याणकारी योजनाएं चला रखी हैं। अधिकारी से पूछो तो कहता है देखता हूं। बेचारे को इससे पहले देखने का समय ही नहीं मिला। कर्मचारी हैं तो वो अपना और अपने अधिकारी का वेतन बनाने और उसकी निकासी में ही लगे रहते हैं। यानि निचोड़ यही निकलता है कि किसी के पास समय नहीं है कि वो किसी मजदूर की फरियाद सुन सके। 

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