Friday, January 12, 2018

SC ने की 'जन गण मन' की बात

सिनेमा हॉल और मल्टीप्लैक्स में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्र गान जन गण मन...का बजाया जाना अनिवार्य किसने किया? ये किसके दिमाग की उपज थी? वो कौन सा तथाकथित राष्ट्रभक्त है जिसको लगा कि उसके देश के लोग राष्ट्रगान का सम्मान नहीं करते या फिर उन्हें राष्ट्रगान की जानकारी नहीं है। वो कौन  सा शख्स है जिसको लगा कि सिनेमा से जोड़ कर राष्ट्रगान को पॉपुलर बनाया जा सकता है। ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो हर भारतीय नागरिक को शर्मिंदा करते हैं। कांग्रेस के नेता और उद्योगपति नवीन जिंदल ने हर नागरिक को राष्ट्रीय तिरंगा फहराने का अधिकार दिलाया। देश का कोई भी नागरिक पूरे सम्मान और गरिमा के साथ तिरंगा लहरा सकता है। अपने घर या संस्थान में राष्ट्र ध्वज को पूरी गरिमा के साथ लगाया जा सकता है। जिंदल की ये कोशिश तारीफ के काबिल है, लेकिन माफ कीजिएगा सिनेमा हॉल में जहां हर आदमी अपने मनोरंजन के लिए पहुंच रहा है वहां आप उसके सामने राष्ट्रगान को मनोरंजनात्मक संकेत के तौर पर पेश कर रहे हो। क्या सिनेमाई पर्दा राष्ट्रगान की गरिमा की सुरक्षा कर सकता है? ज्यादातर का उत्तर नहीं में होगा। सिनेमा हॉल में बैठे दर्शक की क्या मानसिकता हो सकती है, क्या इस पर किसी भी सरकार ने सोचने के लिए वक्त निकाला है। जवाब में शायद नहीं । वरना इस पर मंथन किया  होता तो जरूर दिल और दिमाग में आता कि सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाकर उसका कितना बड़ा अपमान किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर रायपुर के एक मल्टीप्लैक्स में फिल्म 'ऐ दिल मुश्किल' के पहले राष्ट्रगान बजाया और दिखाया जा रहा है। सभी दर्शक राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े हो जाते हैं। लेकिन अफसोस तब होता है जब राष्ट्रगान के तुरंत बाद फिल्म के शुरुआती अंश में चुंबन दृश्य दिखाया जाता है। अब आप ही सोचिए जो दर्शक राष्ट्रगान के सम्मान की मानसिकता में था अचानक उसकी मानसिकता मनोरंजन की फूहड़ता में डूब गई। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले को पलटते हुए अच्छा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान को बजाना स्वैछिक कर दिया है। यानि अब सिनेमा हॉल के मालिकों को राष्ट्रगान बजाने की अऩिवार्यता नहीं रहेगी। उम्मीद है सुप्रीम कोर्ट के इस  फैसले से अब राष्ट्रगान का अपमान रुक जाएगा। 

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