Wednesday, January 31, 2018

सरकारी दर्जे के लापरवाह से पड़ा पाला !

कैसे और किस तरह बताऊं, बात समझ में नहीं आ रही।आएगी भी कैसे ? सरकारी मुलाजिम से जो पाला पड़ा
है। लालफीताशाही में योजनाओं की गर्दन कसते देखा है। अधिकारी-कर्मचारी की लेटलटीफी भी देखी है। सरकारी महकमे में क्या-क्या खिचड़ी पकती है,  इसकी भनक तक किसी को नहीं लगती है। आखिर इस प्रशासनिक अमले को इस बात का दंभ है कि वही सरकार चला रहे हैं। उनके बिना सरकार पंगु है। खैर सरकारी मानसिकता जो भी हो वो सरकार की टेंशन है। फिलहाल हमारी टेंशन ये है कि हम जब किसी सरकारी दफ्तर में अपने आवेदन के साथ पहुंचते हैं तो फिर क्या-क्या होता है, हमें किस-किस  हालात से गुजरना पड़ता है। उसको बयां करने बैठे तो बातों का सिलसिला खत्म नहीं होगा। सो बात शॉर्टकट में कही जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। SBI में खाता खुलवाना था। बेचारे इतने सीधे-साधे कर्मचारी थे कि उऩ्होंने पटना तक की दौड़ लगवा दी। ऐसा लगा खाता ना हुआ बैंक वालों ने कुबेर का खजाना देने के लिए पटना बुलाया था। खैर हमने भी दौड़ लगाई, लेकिन पटना के दफ्तर में पहुंचते ही हमारी सारी ऊर्जा और उम्मीद खत्म हो गई। हम ठहरे साधारण आदमी, सो न कोई आवभगत हुई और न ही सेवा सत्कार। जिस काम के लिए भेजा या बुलाया गया था। उस पर साहब लोगों का तेवर ऐसा था कि हमको लगा कि हमने कोई क्राइम कर दिया है। क्या इस देश में RTI लगाना गुनाह है? गुनाह है तो फिर हम दोषी है और यदि ये कानून है तो हम इसका इस्तेमाल करेंगे। ये आम आदमी का हथियार है जिसके जरिए वो सरकारी दर्जे के लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों को आगाह करता है कि दफ्तर में काम करने के मामले में लापरवाही अब नहीं चलेगी, संभल जाओ। अब पब्लिक जागरूक होने लगी है। अब तुम्हारे दफ्तर के वो सौ बार  चक्कर लगाने वा्ली नहीं है। अब सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 का असर ये है कि अब लापरवाह अधिकारी और कर्मचारी को चक्कर लगाना पड़ सकता है। 

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