Monday, January 22, 2018

गाय का क्या कसूर ?

कहां हैं वो गौ रक्षक, कहां हैं वो गाय को माता मानने वाले? कहां गया वो जज्बा जिसमें गाय के लिए धरना
और प्रदर्शन तो होते ही थे।लेकिन कत्ल भी होने लगे। कहां गए वो लोग जो बीफ के नाम पर हंगामा खड़ा कर देते थे? इन सब सवालों सारांश सिर्फ यही है कि गाय के नाम पर बवाल खड़ा करने वाले लोगों को इस गाय की हालत दिखाई नहीं दे रही है। जो न सिर्फ ठंड से सिकुड़ रही है बल्कि भूख से उसके शरीर का सिर्फ ढांचा ही दिख रहा है। गाय को पटना की सड़कों पर छोड़ दिया गया है सिर्फ और सिर्फ मरने के लिए। कहां गए वो भगवा धारी जो गाय को बचाने के लिए आंदोलन करते हैं? क्या गायों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि गौशालों में अब जगह ही नहीं बची है ताकि इस गाय को भी आश्रय मिल सके। राजनीति की भेंट चढ़ी गायों का सच्चा हितैषी कोई नहीं है। नेता सिर्फ भाषण देना जानता है। अधिकारी सिर्फ कलम चलाना जानता है और लोग हकीकत देखकर बगल से गुजर जाते हैं। मगर अपने दूध से सबका पेट भरने वाली इस गाय की हैसियत इंसानों के लिए जानवर से ज्यादा नहीं है। ठंड की मार सहते हुए ये गाय कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ कह रही है। लेकिन दुर्भाग्य है कि गाय को माता मानने वावे गौ माता की इस हालत पर चुप हैं। चुप्पी के बीच छिपे उस आक्रोश को भी देखना होगा जिसमें इंसान को हिन्दू और मुसलमान के बीच बांटने का कुकर्म किया जाता है। बहरहाल गाय को आश्नय देने को लेकर शासन को पता नहीं, प्रशासन सड़कों पर निकलता नहीं। लिहाजा सवाल उठता है कि गाय की चिंता कौन करें, जबकि जहां इंसान ही ठंड से मरते जा रहे हैं। 

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