Wednesday, January 17, 2018

बिहार में 'दाग' अच्छे हैं !

 बिहार में सुशासन के नारे के बीच एक बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर तथाकथित बिहारियों को गंदगी क्यों
पसंद है? क्या गंदा रहना उनकी आदत में शामिल है? क्या बिहार का सिस्टम ही ऐसा है जहां सरकार या प्रशासन सफाई और गंदगी में फर्क नहीं कर पाता? इस तस्वीर को गौर से देखिए। ये तस्वीर आपको बिहार का वो सच दिखाएगी जिसे देखकर आप भी हैरान हो जाएंगे। ये तस्वीर पटना के कॉपरेटिव हाउसिंग फेडरेशन के बगल की है जहां ये चापाकल लगाया गया है। ये चापाकल बड़ी संख्या में लोगों की प्यास बुझाता है। बड़ी संख्या में लोग यहां पानी पीने आते हैं। लेकिन पानी पीते वक्त उन्हें बदबू इतना परेशान करता है कि बेचारे अपनी प्यास भी पूरी तरह से नहीं मिटा पाते। दरअसल इस चापाकल के पास ही मूत्रालय है जहां लोग मूत्र त्याग करते हैं। इस मूत्रालय की बदबू तो चापाकल तक आती ही है, लेकिन उसके साथ मूत्र भी प्रवाहित होकर चापाकल के पास पहुंच जाता है। मूत्र का प्रवाह और चापाकल के पानी की धार दोनों मिलकर एक अजीब सा समीकरण तय करते हैं और ये समीकरण शासन-प्रशासन के सुशासन के दावे की पोल खोल देता है। अब जरा आप सोचिए राजधानी पटना में ये हाल है तो इस राज्य के दूसरे इलाकों की क्या स्थिति होगी। हालांकि इस समय राज्य के मुखिया नीतीश कुमार का पूरा ध्यान दहेज और बाल विवाह की कुप्रथा को रोकने पर है। शराबबंदी के बाद नीतीश कुमार सामाजिक सुधार की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ रहे हैं। वो अपने विजन के अनुसार सही हो सकते हैं, लेकिन शराबबंदी को लेकर हकीकत यही है कि शराबियों के मुंह से आज भी शराब की बदबू आती है। इस सच के बीच कहना गलत नहीं होगा कि बिहार में 'मधुशाला' से लेकर मूत्रालय के बीच जितनी भी 'बदबू' हैं, उनकी दुर्गंध शायद सरकारी अमला नहीं सूंघ पा रहा है। वरना तस्वीर ऐसी नहीं होती।  

No comments:

Post a Comment