Thursday, January 4, 2018

आंचल का दर्द


                                                                   (1)
पटरी पर ट्रेन तेजी से दौड़ रही है
12 साल का बच्चा मुन्ना खिड़की से बाहर झांक रहा है।
तभी उसकी नजर बरगद के नीचे बैठी एक महिला पर पड़ती है। जो पागल सी दिखती है।
गाड़ी की स्पीड इतनी तेज है कि बरगद का पेड़ और वो महिला पीछे छूट जाती है।

                                                                    (2)

गाड़ी पहाड़पुर स्टेशन पर रुकती है।
सोनू (अपने पापा से ) पापा दादी का घर आ गया
पापा- हां बेटा हमलोग अपने गांव पहुंच गए हैं। थोड़ी देर में तुम दादी के पास पहुंच जाओगे।
सोनू की उम्र 12 साल है।
सोनू काफी खुश है कि वो पहली बार अपने गांव आया है।
लेकिन सोनू के मन से बरगद और महिला की छवि जाती नहीं है।

                                                                    (3)

सोनू के पापा का नाम लक्ष्मण सिंह है।
स्टेशन के बाहर वो रिक्शा ढूंढता है।
लक्ष्मण सिंह- (रिक्शे वाले से ) ऐ रिक्शा खाली है पहाड़पुर गांव चलना है।
रिक्शेवाला- चलेंगे साहब, 50 रुपए लगेंगे।
लक्ष्मण सिंह- अरे पचास रुपए बहुत हैं 30 में चलना हो तो बोलो।
रिक्शेवाला- चलो आप 40 रुपए दे देना मैं आपको पहाड़पुर गांव छोड़ दूंगा।
लक्ष्मण सिंह- चलो ठीक है, लेकिन रिक्शा तेजी से चलाना। ताकि हम जल्द घर पहुंच जाए।
रिक्शावाला- फिक्र मत करो साहब, आपको टाइम पर ही पहुंचाएंगे।
लक्ष्मण सिंह बैग रिक्शे पर रख देता है और पति, पत्नी और बेटा तीनों एक ही रिक्शा पर सवार हो जाते हैं।
रिक्शा गांव की ओर चल पड़ता है।

                                                                   (4)

लक्ष्मण सिंह- बस इस घर के सामने रोक देना
चल बेटा आ गए हम अपने घर
दादी मुन्ना को प्यार से लगे लगा लेती है।

                                                                   (5)

गांव के लड़के क्रिकेट खेलते हैं। मुन्ना भी उनके साथ मिलकर क्रिकेट
खेलता है। मुन्ना जब फिल्डिंग करता है तो उसके पास एक महिला आ जाती है
ये वही महिला है जिसे मुन्ना ने ट्रेन से देखा था। लड़के महिला को देखकर
भागने लगते हैं। वो मुन्ना को भी भागने को कहते हैं।
एक लड़का आवाज लगाता है- भाग मुन्ना भाग...

                                                                  (6)
मुन्ना हांफते हुए घर के आंगन में आता है।
दादी- अरे तू हांफ क्यों रहा है
मां- बेटा क्या हुआ...
दादी- कुछ बोल तो सही
मुन्ना- दादी जब हम क्रिकेट खेल रहे थे तभी
वहां एक आंटी आई...जिसे देखकर सभी भागने लगे।
उन्होंने मुझे भी भागने को कहा। मुझे समझ में नहीं
आया उस आंटी को देखकर सभी क्यों भागने लगे।
दादी थोड़ी बेचैन होते हुए मुन्ना को सीने से लगा लेती है
दादी- बेटा वो डायन है। उसने गांव के कई बच्चों को जादू-टोना
करके मार डाला है। उसके पास भूल कर भी नहीं जाना मेरे लाल
वो डायन है

                                                                     (7)
मुन्ना चांद को निहारता है। वो उससे पूछता है
मुन्ना- क्या तुम्हारे यहां भी डायन है। क्या सचमुच डायन बच्चों को मार
डालती है। मुन्ना छत पर से गांव के अंतिम मकान को देखता है। जिधर से उसका रिक्शा आया था...
वहां उसे फिर वही महिला दिखाई देती है। जिसके बाल बिखरे हैं। वो कचरे के ढेर में कुछ ढूंढ रही होती है।
अचानक उसे कचरे में फेंका गया खाना मिलता है। जिसे हड़बड़ा कमर वो उठाती है और जल्दी-जल्दी खाने लगती है। वो डर के मारे इधर-उधर देखती है और फिर वापस लौट जाती है। मुन्ना उसे देखता रह जाता है और वो महिला उसकी आंखों से ओझल हो जाती है। मुन्ना चुपके से अपने कमरे में आकर सो जाता है। लेकिन मुन्ना के मन से वो महिला गायब नहीं होती है। मुन्ना जानना चाहता है कि आखिर वो महिला बच्चों को क्यों मारती है। क्यों वो कचरे में पड़ा खाना खाती है।

                                                                    (8)
दादी ने मुन्ना को महिला की नजर से बचाने के लिए तांत्रिक को बुलाया
तांत्रिक ने मुन्ना को मंत्र फूंक कर काले रंग का एक माला पहने को दिया।
दादी- बाबा अब तो मेरा पोता उस डायन से सुरक्षित हो गया ना
तांत्रिक- चिंता मत करो, ये माला उस डायन से आपके पोते की सुरक्षा करेगा।

                                                                  (9)

मुन्ना छत पर खड़ा होकर चांद को निहारता है। इतने में एक बार
फिर वो महिला कचरे में खाना ढूंढती है। लेकिन उसे खाना नहीं मिलता है।

                                                                (10)

मुन्ना खाना लेकर बरगद के पेड़ के पास जाता है। वहां उसे वो महिला दिखाई नहीं देती है
लेकिन जैसे ही वो वापस मुड़ता है अचानक उसे वो महिला दिखाई देती है। पहले से डरा सहमा
मुन्ना और डर जाता है। हिम्मत करके वो महिला से बात करने की कोशिश करता है।
मुन्ना- आंटी मैं आपके लिए खाना ले आया हूं। ये लो खा लो। तुम बहुत भूखी हो।
रमकटिया- बेटा तुझे देखकर ही मेरी भूख मिट गई। रात हो गई है जा घर चला जा। मैं
खाना खा लूंगी।

लेकिन मुन्ना नहीं जाता है। वो महिला के बारे में जानना चाहता है।
मुन्ना- तुम यहां क्यों रहती हो, क्या तुम्हारा कोई नहीं है।
रमकटिया- जानते हो बेटा, मैं यहां क्यों रहती हूं, क्योंकि यहां मेरे मासूम बेटे को मारकर
तुम्हारे पिता ने यहां दफना दिया है।
रमकटिया मुन्ना को सारी कहानी बताती है.

                                                              (11)
कहानी 15 साल पहले की है जब रमकटिया लच्छु से विवाह करके ससुराल आई थी। तब के वक्त और आज के वक्त में काफी अंतर आ गया है। तब रमकटिया गांव की बहू थी और अब मरकटिया के नाम से उसकी पहचान एक डायन की है।  रमकटिया की शादी लच्छू यानि लक्ष्मण सिंह से हुई थी। लेकिन वो उसे पसंद नहीं करता था। इसलिए वो बात-बात पर रमकटिया को मारने-पीटने लगता था।
लच्छु- साली तेरी जैसी डायन को झेल रहा हूं ये क्या कम है।
रमकटिया- मैं डायन हूं अरे तू वो चांडाल है जिसने मेरी जिंदगी नरक बना दी है।
लच्छु- अरे अभी देखती जा...मैं तेरी जिंदगी को क्या-क्या बनाता हूं।
रमकटिया- मुझे धमकी मत दे...जा अपनी रखैल के पास...उसी की जिंदगी
संवार...तेरे जैसे मरद से अच्छा मैं बिना मरद के ही रहूं।
लच्छु- घबरा मत हरामजादी, तुझे इस घर से न निकाला तो मेरा नाम
लक्ष्मण सिंह नहीं।
ये कहकर लच्छु गुस्से में घर से बाहर चला जाता है।


                                                             (12)

रमकटिया और लच्छु से एक बेटा भी था। बिरजू जो महज 5-6 साल का मासूम था।
रमकटिया अपने बेटे के साथ सोई हुई रहती है। तभी लच्छु गुस्से में कमरे में प्रवेश
करता है।
लच्छु- अब देख मैं तेरा क्या हाल करता हूं।

लच्छु रमकटिया का मुंह बांधकर उसे लकड़ी की कुर्सी से बांध देता है। जिससे वा वो
चिल्ला पाती है और न ही अपने बेटे को बचा पाती है। लच्छु रमकटिया के जिगर के
टुकड़े को गला दबाकर मार डालता है। बेबस रमकटिया अपने जिगर के टुकड़े को
टुकड़े-टुकड़े होते देखते रह जाती है। वो बदहवास सी हो जाती है।


                                                            (13)

पंचायत बैठती है। गांव के लोगों की भीड़ जमा हो जाती है। लच्छु रमकटिया के खिलाफ पंचायत से शिकायत करती है।
लच्छु- ई ससुरी डायन है डायन, अपने बेटे को खा गई। इतना ही नहीं...ये डायन सती सावित्री भी नहीं है।
मेरी पंच परमेश्वर से गुजारिश है कि मुझे इस डायन से बचाया जाए।

पंचायत रमकटिया के खिलाफ फैसला देती है। रमकटिया की बात सुने बिना पंचायत
उसे गांव से बाहर रहने का हुक्म सुनाती है। धीरे-धीरे पंचायत की भीड़ खत्म हो जाती है
उस जगह पर सिर्फ रमकटिया खड़ी रहती है। वो तब तक खड़ी़ रहती है जब तक सूरज डूब नहीं जाता।

                                                            (14)

रमकटिया की आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं।
रमकटिया- ये जगह देख रहे हो...इसी जगह पर तुम्हारे बाप ने मेरे मासूम बच्चे को मारकर
दफना दिया था। मैं कब का ये गांव ये इलाका छोड़ देती है, लेकिन नहीं...मुझे अपने बच्चे के साथ
रहना है। भले वो मर गया है, लेकिन उसकी रूह मेरे साथ है। इस बरगद के नीचे मेरी ममता की छांव
में मेरा बेटा सो रहा है। कोई उससे उसकी नींद ना छीन ले...इसलिए मैं यहां से कई नहीं जाती ....

मुन्ना रमकटिया के आंसू पोछता है और कहता है कि वो भी तो उसका बेटा है। रमकटिया मुन्ना को सीने से लगाकर फफक पड़ती है।


                                                           (15)

सूरज उगता है। इतने में लक्ष्मण और उसकी पत्नी माला पूरे परिवार और गांव वालों के साथ पहुंचता है।
रमकटिया की गोद में सोए मुन्ना और रमकटिया की नींद खुलती है।
दादी- हे राम इस डायन ने मेरे पोते को भी अपने वश में कर लिया। लच्छु तांत्रिक बाबा को बुलाओ नहीं
तो ये डायन मेरे पोते को खा जाएगी।
मुन्ना- कोई जरूरत नहीं है दादी...यहां कौन डायन है और कौन मां है....ये मैं समझ चुका हूं। अगर आपकी नजर में ये डायन हैं तो मैं डायन का बेटा कहलाना पसंद करूंगा।
लक्ष्मण- दो थपड़ में मां-बेटे के प्यार का भूत नीचे उतर जाएगा।
रमकटिया- आ गए ना अपनी असली औकात पर। ना लच्छु ...उस समय तुमने मेरे हाथ और मुंह बांध रखे थे और मेरी आंखों के सामने मेरे जिगर के टुकड़े का गला घोंटकर हत्या कर दी थी...अब वक्त बदल गया है। मुन्ना मेरा बेटा है...मेरे जिगर का टुकड़ा है...मैं इसे टुकड़े-टुकड़े नहीं होने दूंगी, क्योंकि आज मेरा मुंह और दोनों हाथ खुले हैं।
                                                            (16)
इस खुलासे के बाद दादी सदमे में आ जाती है...
दादी-लच्छु तू ऐसा काम करेगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। उस मासूम का गला घोंटने से पहले तेरे हाथ नहीं कांपे। तू बहुत बड़ा शैतान है।
(रमकटिया से...)
दादी- बहुरिया हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई जो हमने लच्छु पर भरोसा किया। चल तुझे तेरा घर बुला रहा है
दादी रमकटिया को गले लगा लेती है।

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