Monday, December 4, 2017

क्या नीतीश ने राजधर्म निभाया ?

बिहार में सात निश्चय के साथ नीतीश सरकार चल रही है। 2015 में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड और कांग्रेस के साथ लालू प्रसाद यादव के राजद का महागठबंधन हुआ। जहां भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव में हिन्दू कार्ड खेलने की कोशिश की तो वहीं राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने इस चुनाव को अगड़ों और पिछड़ों की लड़ाई बताया। जाहिर है जीत लालू की होनी थी, क्योंकि बिहार की जनता धार्मिक स्तर पर उतनी संवेदनशील नहीं है जितनी की सामाजिक तौर पर । जब बिहार की सत्ता पर लालू का कब्जा था तब तक लालू की छवि पिछड़ों के मसीहा की बनी हुई थी। तथाकथित तौर पर उन्हें राजनीति का जोकर कहने वाले हो सकते हैं, मगर ये भी सच है कि तथाकथित राजनीति के इस जोकर ने सामाजिक क्रांति में अपना अहम योगदान दिया। उन्होंने पिछड़े वर्ग को वो शक्ति और नेतृत्व दिया जिसके दम पर पिछड़ों ने बिहार की राजनीति में अपनी पहचान और दखल पैदा किया। नीतीश कुमार भी पिछड़े वर्ग का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन उन्होंने पिछड़ों का मसीहा नहीं कहा जाता है। कहने वाले उन्हें विकासपुरुष के नाम से पुकारते हैं। नीतीश को विकास पुरुष बनने का रास्ता लालू यादव ने ही दिया है।  लालू राज के कुशासन का नतीजा निकला कि नीतीश के सत्ता में आते ही बिहार की जनता उन्हें सुशासन बाबू के नाम से पुकारने लगी। यहां ये जिक्र  करना अहम होगा कि पिछले 15 वर्षों में बिहार की सामाजिक स्थिति में काफी बदलाव आया है। साक्षर लोगों की संख्या बढ़ी है। बिहार के लोगों की अहम बात ये है कि उन्हें राजनीति की अच्छी समझ रहती है। मगर फिर भी बिहार का समाज जातीय समीकरण में जकड़ा हुआ है। इसे नीतीश सरकार भी नहीं तोड़ पा रही है। अब बात 2015 के विधानसभा चुनाव की। जिसमें जनता ने प्रचंड बहुमत देकर नीतीश-लालू-कांग्रेस के महागठबंधन को सत्ता के सिंहासन पर बिठाया। राजनीति में अनुभवहीन लालू के छोटे बेटे तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाया। बड़े बेटे को स्वास्थ्य मंत्री बनाया। समाजवाद की बात  करने वाला परिवारवाद  के रहमोकरम पर निर्भर हो गया। इस स्थिति को नीतीश जानते थे, लेकिन उन्होंने मोदी और लालू में लालू को चुना। 243 सीटों वा्ली विधानसभा में जहां राजद को 80 सीटें मिली वहीं नीतीश को 71 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। महागठबंधन को जहां 178 सीटें मिलीं वहीं एनडीए अलायंस को 58 सीटों पर संतोष करना पड़ा। लालू की पार्टी को ज्यादा सीटें मिलने पर नीतीश कुमार समझ चुके थे कि उनके विकास कार्यों की कोशिशों पर लालू का जातीय फैक्टर भारी पड़ गया। इस चुनाव में नीतीश और भाजपा दोनों को नुकसान हुआ।  कहना गलत नहीं होगा कि नीतीश के लिए NDA से अलग होना महंगा पड़ गया। जिसके चलते उन्होंने बिहार की जनता के जनादेश को दरकिनार करते हुए दोबारा भाजपा से गठबंधन कर लिया और एकाएक जदयू और बीजेपी की सरकार  सातत निश्चय के साथ बन गई। मोदी से नफरत करने वाले नीतीश मोदी के सबसे अच्छे दोस्त बन गए। केंद्र में भी अपनी सरकार और राज्य में भी अपनी सरकार। विकास कार्यों के लिए अब केंद्र से फंड मिलने में दिक्कत नहीं  होगा और नीतीश कुमार की सुशासन बाबू की जो इमेज बनी है उसमें और निखार आएगा। मगर इसके साथ सबसे अहम बात यही है कि लालू राज ने बिहार को  जिस रसातल में पहुंचा दिया था। नीतीश एनडीए में आकर यदि बिहार का विकास कर रहे हैं तो इसमें कोई गलत बात नहीं हो सकती। राजधर्म भी यही कहता है कि देश, राज्य का विकास सबसे पहले होना चाहिए। दिन-ब-दिन समाज तरक्की के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़े, तभी देश, राज्य और समाज के साथ उस व्यक्ति का भी भला होगा जो समाज में सबसे पिछली पंक्ति में बैठा है। 

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