Saturday, December 2, 2017

चलती का नाम गाड़ी !

पैसा, शोहरत और टैलेंट क्या नहीं है बॉलीवुड के पास ? लेकिन मोहब्बत की जगह नफरत की दीवार खड़ी करके लोगों का मनोरंजन करना बॉलीवुड की किस मानसिकता को जाहिर करता है। इसे समझना होगा। 1913 में राजा हरिश्चंद्र से लेकर अब तक संजय लीला भंसाली की अटकी हुई 180 करोड़ की लागत वाली फिल्म पदमावती तक का सफर चंद लाइनों में समेट पानी मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। विरोध तब भी हुआ था और विरोध आज भी हो रहा है। मंजे हुए कलाकार कल भी थे और आज भी है। फिल्म की नायिका दीपिका पादुकोण को अपने अभियन पर गर्व हो सकता है। अभिनेता रणवीर सिंह एक बार फिर अपनी काबिलियत का लोहा मनवा सकते हैं। शाहिद कपूर अपनी सशक्त मौजूदगी दर्शा सकते हैं। इन सबके बीच फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली अपनी पुरानी लीक पर चलकर नया कमाल दिखा सकते हैं। मगर वक्त उनका साथ नहीं दे रहा है। फिल्म पदमावती का निर्माण करके उन्होंने कौन सा गुनाह कर दिया है। इस बात को वो खुद भी नहीं समझ पा रहे होंगे। लेकिन समझने वाली बात ये है कि संविधान की धारा 19 (एक) के तहत मिली वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस मामले में क्या मायने रखती है। फिल्म का मुख्य उद्देश्य होता है लोगों का मनोरंजन करना।  अब लोग के मनोरंजन के अधिकार का विरोध के नाम पर अतिक्रमण करना कितना जायज ठहराया जा सकता है। हालांकि एक तरफ संविधान वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है वहीं दूसरी ओर उस पर बंदिशें भी लगाया हुआ है। जिसका राज्य सरकारें अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए दुरुपयोग भी करती हैं। यहां ये चर्चा करना गैरजरूरी होगा कि किन-किन राज्यों ने फिल्म पदमावती पर बैन लगाया है या इस तरह की मंशा रखे हुए है। बुनियादी रूप से मसला रानी पद्मिनी और उनके साथ 16 हजार महिलाओं के साथ जौहर करना उस स्वाभिमान को दर्शाता है जिसके तहत रानी पद्मिनी और उऩके साथ की महिलाओं ने अलाउद्दीन खिलजी की गुलामी को ठुकराते हुए जौहर को स्वीकार कर लिया। अब ऐसे में इस तथ्य को तोड़-मरोड़ कर पेश करना एक तरह से राष्ट्रीय स्वाभिमान से खिलवाड़ करना है। जिस तरह से महाराणा प्रताप और शिवाजी ने विदेशी राजाओं को युद्ध में कई बार पराजित किया। लेकिन जब खुद पराजित हो गए तो फिर दुश्मन के पैर की धूल चाटने के बजाय मौत को स्वीकार कर लिया। खिलजी से लेकर मुगल तक के काल में भारतीयों ने पराक्रम में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा। वहीं अंग्रेजों के जमाने में बाबू वीर कुंअर सिंह का बलिदान भी याद किया जा सकता है। इतिहास के पन्ने पलटने पर अतीत का ज्ञान होता है। अब यदि इन पन्नों से छेड़छाड़ करके एक ऐसी कहानी तैयार की जाए जो लोगों की आस्था को चोट पहुंचाती हो। तो फिर भारतीय संविधान की धारा 19 क (2) का उपबंध भी लागू होता है। रचनात्मकता को बढ़ावा मिलना चाहिए, लेकिन ऐसा भी बढ़ावा किस काम का जो समाज में उपद्रव मचा दे। मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने सरस्वती की एक ऐसी आपत्तिजनक पेंटिंग तैयार की थी जिस पर भारी विवाद हुआ था। जाहिर है यहां पर कलाकार या फिल्मकार के लिए आचार संहिता की जरूरत महसूस की जा रही है। कुल मिला कर बॉलीवुड की ये महती जिम्मेदारी है कि वो अपनी रचनात्मक कृतियों के साथ समाज को उसका आईना दिखाए। इतिहास पन्ने पलटने का विषय है जबकि मौलिकता से युक्त रचनात्मक कृति समाज को नई दिशा दे सकती है। 

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