Thursday, November 9, 2017

फसल की बर्बादी से सिसकता किसान

जब भी फसल की बर्बादी की तस्वीर दिखाई देती है, तब हर किसान का दामन आंसुओं से भीग जाता है।
भीगना भी चाहिए, क्योंकि उसके पास रोने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। विकल्प है तो वो है खुदकुशी। आत्महत्या की बात सुनते ही रोंगते खड़े हो जाते  हैं, लेकिन ये सच है कि देश का किसान गरीबी और लाचारी से तंग आकर आत्महत्या कर रहा है, मगर देश और राज्य चलाने वाले उन प्रधान सेवकों को किसान का दुख-दर्द सिर्फ आंकड़ों में नजर आता है। उन्हें वो दर्द महसूस नहीं होता जिसे किसान और उसका परिवार महसूस करता है। हालांकि सरकार का दावा है कि उसने किसानों के हितों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं संचालित कर रही हैं। मगर हालात है कि सुधरने का नाम नहीं लेते। जाहिर है योजनाएं तो कई बनी, लेकिन वो धरातल पर नहीं उतर पाई या यूं कहें कि वो योजनाएं किसानों तक नहीं पहुंच पाई या किसान उन योजनाओं तक नहीं पहुंच पाया। अब इस समस्या का समाधान क्या है? इस पर कभी टीवी पर तो कभी अखबार में चर्चा कर लिया जाता है, लेकिन एसी की ठंडक इस समस्या को ठंडे बस्ते में डाल देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फसल बीमा योजना, मृदा जांच सुविधा, कम ब्याज पर ऋण, सब्सिडी पर विद्युत की व्यवस्था की है, लेकिन सरकार की तमाम योजनाएं समाज के निचले और पिछड़े व्यक्ति तक पहुंचते-पहुंचते धराशायी हो जाती हैं। मध्य प्रदेश का उधारण ले तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक हर दिन 6 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। NCRB के मुताबिक किसानों के आत्महत्या के मामले में पहले नंबर पर महाराष्ट्र है जो सूखे की मार झेलता है। वहीं दूसरे नंबर पर कर्नाटक है जिसका कावेरी जल विवाद तमिलनाडु के साथ है। तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है जो पानी के लिए भी तरसता है और उन्नत स्तर की खाद, बीज और कृषि उपकरणों के लिए तरसता है। यही हाल बिहार का है जहां सुशासन का दावा किया जाता है। जहां से किसी किसान के आत्महत्या करने की खबर नहीं आती, लेकिन ये भी सच है कि बिहार का निवासी राज्य की सीमा से बाहर निकल कर अपने लिए काम की तलाश कर लेता है । शायद यही वजह है कि बिहार में किसान आत्महत्या की खबर समाचार बनने से पहले ही दम तोड़ देती है। 

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