Wednesday, November 8, 2017

शहर के नालों का 'काला' सच

(बेतिया, पश्चिम चंपारण) बारिश में तबाही, किसी को नजर नहीं आती लापरवाही! मगर कोई क्या करें
सिस्टम तो यही है जो दिख रहा है। दिखना कोई बुरी बात नहीं है। जहांपनाह आप दिखाते रहिए, पब्लिक भी देख कर कहती रहेगी जहांपनाह तुसी ग्रेट हो। अब आप कितने महान है? इसका फैसला तो जनता करेगी। लेकिन समझ में नहीं आता कि बेतिया में नगरपालिका है भी कि नहीं। यदि नगरपालिका का अस्तित्व है तो उसकी मौजूदगी क्यों नहीं दिखती? यदि नगरपालिका होती तो ये तस्वीर चीख-चीख कर नालों की बदहाली को बयां नहीं करती। शहर का हर नाला कचरे से भरा पड़ा है जिसका नतीजा बरसात के दिनों में शहरवासी भुगत चुके हैं। बारिश जमकर हुई और नाले भी जमकर जाम हुए। नतीजा सड़कों पर तो पानी का सैलाब दिखा ही, इसके साथ ही शहर के कई इलाकों में घरों में पानी घुस गया। अब किसको  कितना नुकसान हुआ, ये आप मत पूछिएगा। पूछने से कोई फायदा नहीं, क्योंकि कोई बताने वाला नहीं है। इस शहर में ऐसा कोई नहीं है जो नालों की सफाई का मुद्दा नगरपालिका समेत प्रशासन के सामने उठा सके। सरकारी मुद्दों पर कोई प्राइवेट आदमी क्यों बोलेगा? बोलना भी नहीं चाहिए, वरना चुप करा दिया जाएगा। आखिर इसी शहर में रहना है। ऐसे में शासन-प्रशासन से पंगा कौन मोल लेगा? नगरपालिका में कितने सफाई कर्मचारी हैं? इसका डिटेल किसी को नहीं मालूम। पता करने पर कोई बताने वाला नहीं है। दो चार महिलाएं सड़कों पर झाड़ू लगाती जरूर नजर आती हैं, लेकिन वो भी खानापूर्ति जैसा लगता है। यहां जो तस्वीर लगी हैं वो समस्या की जानकारी दे रही हैं। अब शासन, प्रशासन और नगरपालिका इसका क्या समाधान निकालते हैं? ये देखने और समझने के लिए चलिए थोड़ा इंतजार कर लेना चाहिए। वैसे बेहतर सुविधाओं का इंतजार तो हम बरसों से करते आ रहे हैं, चलिए थोड़ा और इंतजार कर लेते हैं। मगर यहां वही दुविधा आ खड़ी हुई है जो सालों से हमारा पीछा कर रही है। मोदी सरकार का स्वच्छता अभियान सिर्फ फोटो तक सिमट कर रह गया है। इस देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्वच्छता को पसंद करते थे। उन्हें गंदगी से नफरत थी। गनीमत है कि इस बात की कद्र सरकार भी करती है।  केंद्र सरकार तारीफ के काबिल है कि उसने सफाई अभियान पर फोकस किया है। मोदी सरकार स्वच्छता अभियान को रुपए तक ले आई है। सांकेतिक तौर पर बापू के चश्मे को सरकार के स्वच्छता अभियान का लोगो बनाया गया है। लेकिन गंदगी की इस बड़ी समस्या का कोई कारगर समाधान फिलहाल नजर नहीं आता। कचरा जस का तस बिखरा पड़ा है। शहर का हर नागरिक बिखरे कचरे को देखता है और आगे बढ़ जाता है। शहर का हर नागरिक जानता है कि शहर गंदा हुआ तो क्या हुआ। सभी को गंदगी में जीने की आदत है । अब ये आदत कब बदलेगी, शायद खुदा भी नहीं जानता।  

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