Sunday, November 12, 2017

5 किलो का अवैध गैस सिलेंडर

(बेतिया, पश्चिम चंपारण) जान है तो जहान है, लेकिन यदि कोई खतरे को नजरअंदाज कर दें तो भइया हम
तो यही कहेंगे वो शख्स इतना महान है कि उसे अपनी जान की जरा भी परवाह नहीं है। चलिए सीधे विषय पर बात करते हैं। वरना आप बोर हो जाएंगे और इस ब्लॉग को पढ़ना छोड़ देंगे। ऐसा हम कतई नहीं चाहेंगे। लिहाजा सीधे मुद्दे पर आते हैं। ये तस्वीर जो कुछ बयां कर रही है वो एक हकीकत है। शहर में ऐसी कई दुकानें मिल जाएंगी जहां इस प्रकार के अवैध छोटे सिलेंडर दुकानों पर खुलेआम बिक रहे हैं। बिकने की बात तो आम है ही, जब इन छोटे सिलेंडरों में गैस खत्म हो जाती है तो उसको 14 किलो वाले सरकारी और घरेलू इस्तेमाल के सिलेंडरों के जरिए LPG भरी जाती है। गैस भरवाने में भी रिस्क है। लेकिन दुकानदार इतना हिम्मतवाला है कि पूछिए मत। शायद ये हो सकता है कि वो ये सोचता होगा कि नो रिस्क नो गेन। लिहाजा वो अवैध रूप से रिस्क लेकर गैस की कालाबाजारी कर रहा है। मामले की संवेदनशील पहलू ये है कि इस तरह का गोरखधंधा प्रशासन की नाक के नीचे हो रहा है। लेकिन प्रशासन को गैस की बदबू खुशबू की  तरह महसूस हो रही है। इसलिए भी अधिकारी नींद में ही रहकर अपनी-अपनी सैलरी उठाते रहते हैं। सरकारी नौकरी है तो उम्मीदतन पहली तारीख को तनख्वाह तो मिल ही जाती होगी। ज्यादा कसरत करने से क्या फायदा? कहीं शरीर में इधर-उधर मोच आ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे। बहरहाल सरकारी अमले की क्या मजबूरी है ये शासन को पूछने का हक है। आम आदमी को पूछने का कोई हक नहीं है। वोट देने का हक है तो देते नहीं, अपने नेताओं से इसके बारे में पूछकर उल्लू थोड़े बनना है। ऊपर से इस आम आदमी की परिधि में ऐसे कई लोग है जो इन छोटे-छोटे सिलेंडरों का अवैध रूप से जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे उनको भोजन और रोशनी मिल रही है। ऐसे में वो क्यो गैस की कालाबाजारी के खिलाफ आवाज उठाएंगे। अंधरे नगरी चौपट राजा वाली कहावत तो आपने सुनी होगी, लेकिन उसका इससे को मतलब नहीं है। मतलब की बात ये है कि जो इस कालाबाजारी के खिलाफ आवाज उठाएगा, उसकी आवाज गैस की कालाबाजारी के शोर में दब जाएगी। कुछ समझे, नहीं समझे तो इसमें किसी की क्या गलती हो सकती है?

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