Sunday, October 8, 2017

बिहार में गंदगी का 'गणित' !

भारत का स्वच्छता अभियान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साफ-सफाई की मुहिम और सांकेतिक तौर पर  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चश्मा। यदि बापू के चश्मे से बाहर निकल कर देखा जाए तो साफ-सफाई को लेकर देश की स्थिति काफी बुरी है। देश आजादी के 70 साल पार कर गया लेकिन अभी तक ये देश गंदगी को अपनी जिंदगी समझ कर जीता रहा है। बिहार की खेतों की हरियाली मन मोह लेती है, लेकिन गंदगी के मामले में इस राज्य ने सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। गंदगी की एक से बढ़कर एक तस्वीरें देखने को मिल जाएंगी। यानि इस राज्य के लोगों को गंदगी में रहने की आदत सी हो गई है। यही वजह है कि कचरा सड़कों पर फेंका जाता है। मोहल्ले के कोने पर गंदगी का अंबार लगा दिया जाता है। वैसे राज्य में समस्याएं कई हैं, लेकिन जब पूरे देश में गंदगी के खिलाफ मुहिम चलाया जा रहा है तो फिर इस मुहिम में बिहार पीछे क्यों है ? ये सवाल बड़ा है क्योंकि देश की बड़ी आबादी यहां निवास करती है। दलित हो, अल्पसंख्यक हो या फिर कोई पिछड़ा वर्ग का इंसान, सबकी यही कहानी है। यहां तक की अगड़ी जाति के लोगों को भी गंदगी पसंद है शायद यही वजह है कि गंदगी के खिलाफ बिहार में कोई आवाज बुलंद नहीं होती।  पीएम मोदी सांकेतिक रूप से झाड़ू लगाकर सफाई का संदेश देते हैं, लेकिन उस संदेश का असर न्यूज चैनल और अखबारों तक ही सिमट कर रह जाता है। धरती पर उस सफाई अभियान का असर नहीं दिखता। यहां ये गौर करना जरूरी लगता है कि पीएम मोदी गंदगी के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं वहीं मोहल्ला या वार्ड स्तर पर देखा जाए तो नगरपालिका और नगर निगम में सफाईकर्मियों की अच्छी खासी संख्या है। लेकिन उनकी लापरवाही का खामियाजा आम जनता को झेलना पड़ता है। निगम कर्मी  यदि ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाएं तो कम से कम सड़कों पर गंदगी का अंबार नहीं दिखेगा। रही बात लोगों की तो सरकार से इतना कहना तो  बनता है  कि वो जनता को साफ-सफाई से जीने का सलीका तो सिखाए। तस्वीर बदलने में देर नहीं लगेगी। बस गंदगी फैलाने की आदत बदल जाए तो बिहार भी मिसाल बन जाएगा।   

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