Sunday, September 3, 2017

पीएम मोदी का विजन कितना कच्चा और कितना पक्का ?

दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी। मुश्किल हालात हैं जी। कैसे पार पाए जी। डायलाॅग फिल्मी हो सकता है, लेकिन हालात फिल्मी नहीं है। सच से आशिकी है और झूठ से बचपना। मोदी राज में देश की सूरत क्या होगी? ये सवाल बहुमूल्य है । मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया की दिशा तो मोदी सरकार ने तय कर दी है। लेकिन क्या इस देश के नागरिक मोदी के विजन को समझ पाए हैं। वर्तमान परिस्थितियों में इस सवाल का जवाब नहीं मिलने वाला है। क्योंकि जो जवाब मिलेगा उसको वर्तमान भारत नहीं समझ पाएगा। मोदी का विजन पिछड़ेपन की सीमा से बाहर है
। खुद मोदी अपने विजन को लेकर आशावान हो सकते है। लेकिन आश्वस्त नहीं हो सकते हैं। योजना आयोग की जगह नीति आयोग ने ले ली है। नतीजे उत्साहजनक नहीं हैं। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं। उन्हें देश के विकास में योगदान देने के बजाय विदेश में पढ़ाना ज्यादा बेहतर समझा। मोदी 3 सितंबर को अपने मंत्रिमंडल में विस्तार के साथ फेरबदल कर सकते है। मगर इस फेरबदल में जो लोग आएंगे और जो लोग जाएंगे। उनके स्वरूप को मोदी तय करेंगे। मोदी सरकार की तमाम योजनाएं हैं। जिससे देश का विकास हो रहा है। विदेशों में भारत का डंका बज रहा है। अब ये अलग बात है कि देश की जनता इससे अनजान है, क्योंकि वो अक्ल की कच्ची है। जिस विजन के साथ मोदी सत्ता पर काबिज हैं। उसके संदर्भ को समझना आसान नहीं है। तीन साल बीत गए दो साल बाकी है। वादे के मुताबिक मोदी यानि जनता के प्रधान सेवक अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड लेकर जनता से मुखातिब होंगे। यहां बड़ा सवाल यही है कि क्या मोदी देश की बदहाली की बात करेंगे जो उन्हें कांग्रेस से विरासत में मिला है। मोदी को कम से कम 10 साल का मौका मिलना चाहिए। जिससे वो जनता को अपना विजन समझा सकें और देश के विकास में अपना योगदान दे सकें।
एक के बाद एक लगातार हुए रेल हादसों को प्रभु भी नहीं रोक पाए हैं।नोटबंदी से जनता को जो परेशानी हुई वो अलग उल्टा सरकार को ही घाटा हो गया। खैर परिपक्व विजन के साथ जब देश आगे बढ़ेगा। तब न दिल बच्चा रहेगा और न ही कच्चा रहेगा। जो पास रहेगा वो है विकास की पटरी पर सरपट दौड़ता हिन्दुस्तान होगा।

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