Tuesday, September 26, 2017

नाम बदलने की 'बीमारी' !

भारत में नाम बदलने की परंपरा काफी पुरानी है। बॉलीवुड में फिल्म अभिनेता  खान यूसुफ खान ने अपना नाम बदलकर दिलीप कुमार कर लिया। अभिनेत्री महजबीन ने अपना नाम बदल कर मीना कुमारी कर लिया। राजीव भाटिया ने अपना नाम अक्षय कुमार कर लिया। बॉलीवुड में ये फेहरिस्त लंबी  है। लिहाजा अब बात उस अभिनेता की कर लेते हैं जिन्हें मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार कहा जाता है। जो अपनी एक फिल्म में विदेशियों को बताते हैं कि वो जिस देश के रहने वाले हैं वो भारत है। गनीमत है कि सरकार ने भारत का नाम नहीं बदला। वरना विदेशियों को मानचित्र  में भारत को ढूंढने कवा्यद करनी पड़ती कि आखिर ये भारत कहां गायब हो गया। चलो अभी तक तो अच्छा है कि भारत का नाम आर्यावर्त नहीं हुआ, वरना देशभक्त भारत का गीत सुनाते और 'आर्यावर्त' सरकार अपना फरमान सुनाती कि उसने देश के साथ प्रदेश और प्रदेश के साथ शहरों के नाम बदल दिए हैं। राज्यों का विभाजन हुआ तो नए राज्यों को नया नाम और पहचान मिली। लिहाजा इसको लेकर कोई उलझन नहीं है। लेकिन जिस तरह से देश के प्रमुख शहरों के नाम बदले गए हैं। उसको लेकर खुशी भी जताई जा सकती है और गम भी। अब यहां ये कहना गलत होगा कि नाम बदलने में क्या रखा है। जरा सोचिए यदि फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार फिर से अपना नाम बदलकर राजीव भाटिया कर लें तो आपको कितनी उलझन होगी? ये उलझन और भ्रम उन शहरों को लेकर हो रहे हैं जिनके नाम बदल दिए गए हैं। ताजा उदाहरण कांडला पोर्ट है जिसका नाम बदल कर पंडित दीनदयाल पोर्ट कर दिया गया है। बंदरगाह का नया नामकरण हुआ। इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। कांग्रेस के शासनकाल में तमाम एयरपोर्ट के नाम कांग्रेसी नेताओं के नाम पर रखे गए हैं। अब इस लिस्ट में कुछ एक नाम गैर कांग्रेसियों के निकल आए तो माफ कीजिएगा। लेकिन ये नाम बदलने की बीमारी आजकल बढ़ती जा रही है। क्या पता कल को भोपाल के राजा भोज एयरपोर्ट का नाम बदलकर उमा भारती कर दिया जाए। क्या पता पटना के जयप्रकाश एयरपोर्ट का नाम बदल कर लालू प्रसाद यादव के नाम पर कर दिया जाए। क्या पता दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट का नाम बदलकर लालकृष्ण् आडवाणी के नाम पर कर दिया जाए। जो भी हो नाम बदल जाए तो पहचान बदल जाती है। जिस तरह से सरकारों ने अपने-अपने क्षेत्राधिकार का सदुपयोग किया या  दुरुपयोग। जो भी किया उसकी लिस्ट आप भी गिन लीजिए। बंबई का नाम बदलकर मुंबई कर दिया गया। मद्रास का नाम बदलकर चेन्नई कर दिया गया। कलकत्ता का नाम बदल कर कोलकाता कर दिया गया। बड़ौदा का नाम बदलकर बडोदरा कर दिया गया । कलीकट को कोझीकोड बना दिया गया। कोचीन को कोच्चि, बनारस को वाराणसी, टूटीकोरिन का नाम बदल कर तूतुकुडी कर दिया गया। नाम को अऩाम बनाने का काम लगातार जारी है। केप कोमोरिन को कन्याकुमारी नाम दिया गया। वैसे कन्याकुमारी ना्म ज्यादा अच्छा लगता है।  लेकिन नाम परिवर्तन को लेकर अब क्या अच्छा लगता है और क्या बुरा। ये तो जनता पर छोड़ देना चाहिए, यही बेहतर होगा। गुलबर्ग का नाम बदल कर कलबुरगी कर दिया गया। इसी तरह बेलगाम का बेलागावी, सक्ची का जमदेशपुर, गुड़गांव का गुरुग्राम, पा्लघाट का पलक्कड़, महू का नाम बदलकर डॉक्टर अंबेडकर नगर कर दिया गया। नाम को बदलने के फैसले का इतिहास भी गवाह रहा है। प्रयाग  का नाम इलाहाबाद, पाटलिपुत्र का नाम बदल कर पटना और भाग्यनगर का नाम बदलकर हैदराबाद कर दिया गया। शहरों के नाम बदलने की सिलसिला अभी थमा नहीं है। ऐसे कई शहर के जिनके नाम बदलने की मांग की जा रही है या फिर खुद सरकार नाम बदलने पर विचार कर रही है। नाम बदलने की बीमारी से अब तो गली मोहल्ले भी सुरक्षित नहीं हैं। दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदल कर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम कर दिया गया है। बड़ी हैरानी की बात है कि कलाम साहब को सरकार ने गली-मोहल्ले तक सीमित कर दिया। जबकि कलाम साहब का विजन देश की तरक्की को लेकर था।  जाहिर है  कलाम साहब का विजन इस नाम परिवर्तन के सीजन में कहीं गुम हो गया है। शहरों के नाम परिवर्तन  सरकार की मजबूरी है या फिर शौक। ये तो सरकार ही बेहतर बता सकती है, लेकिन विकास की बात करने वाली सरकार इतिहास बदलने की कोशिश क्यों कर रही है। इसका जवाब सरकार ही बेहतर तरीके से दे सकती है। अलबत्त्ता नाम परिवर्तन का खामियाजा इतिहास को भुगतना पड़ रहा है।     

No comments:

Post a Comment