Monday, September 25, 2017

नरेंद्र मोदी का पूंजीवाद या राष्ट्रवाद...!

रोटी, कपड़ा और मकान के साथ बदलते जमाने में लोगों की बुनियादी जरूरतों में भी बढ़ोतरी हुई है। लोगों को अब बिजली, पानी और सड़क भी चाहिए। अब तक भारत के ज्यादातर इलाकों की सड़कें इतनी खस्ता हालत में थी कि मत पूछिए। चार पहिया वाहन हो या फिर दो पहिया गाड़ी। एक समय था जब गड्ढों से भरी सड़कें लोगों की यात्रा की सूरत बिगाड़ देती थीं। अटल सरकार में सड़कों को लेकर काम हुआ। अब ये मत पूछिएगा कि कितना हुआ? जितना भी हुआ, उस पर संतोष कर लेना चाहिए। आखिर पैसा आसमान से तो बरसता नहीं। मनमोहन सरकार में भी सड़कों पर काफी काम हुआ। लेकिन जिस तरीके से मोदी सरकार काम कर रही है। उसकी तारीफ की जाए या आलोचना। कहना मुश्किल है। भले देश में आलोचना करने वाले पत्रकारों की जमात है, लेकिन ऐसा लगता नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इऩ आलोचकों से आहत भी होते होंगे। खुद को जनता का प्रधान सेवक कहने वाले नरेंद्र मोदी जितनी सफाई पसंद करते हैं शायद उतना ही काम करना भी पसंद करते हैं। सत्ता के सिंहासन पर बैठने के बाद नरेंद्र मोदी ने जादू की छड़ी नहीं घुमाई। जिसकी शायद लोगों को उम्मीद थी। बस उन्होंने वो सभी काम शुरू कर दिए। जिसके बारे में चुनाव के पहले उन्होंने जनता से जो वादा किया था। उसको निभाने की भरपूर कोशिश शुरू कर दी है। अब ये कोशिश किसी को पसंद आएगा या नहीं। इस मुद्दे पर बहस की जा सकती है और होनी भी चाहिए। मोदी का झुकाव पूंजीवाद की तरफ है ऐसे में समाजवाद का सपना कैसे देखा जाए? चाहे जो भी हों, लेकिन ये भी सच है कि मोदी राज में काम तो हो रहे हैं। आइए अब देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी याद कर लें। नेहरू ने भी देश के लिए बहुत कुछ किया। लिहाजा मोदी के  विजन की नेहरू के विजन से तुलना नहीं की जा सकती। खुद पीएम मोदी भी नहीं चाहेंगे कि उनके विजन की तुलना जवाहरलाल नेहरू से की जाए। वैसे ये कहने की जरूरत नहीं है कि नरेंद्र मोदी RSS के विजन के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इस समय राष्ट्रवाद को चरम पर तो नहीं कहेंगे, लेकिन पिछले दो-तीन सालों से राष्ट्रवाद की भावना जितनी तेजी से प्रबल हुई है। उसमें नरेंद्र मोदी की अहम भूमिका है। उऩके कई मंत्री और बीजेपी के नेताओं ने अनर्गल बयानबाजी करके दहशत का माहौल पैदा कर दिया था। ये नेता हिन्दुत्व की परिभाषा गढ़ने लगे। अगर हिन्दुत्व को सही मायने में समझने की कोशिश की जाए तो हिन्दुत्व का एजेंडा विकास का मॉडल अपनाने में अहम भूमिका अपना सकता है। शायद पीएम मोदी इस तथ्य को बखूबी जानते हैं। लिहाजा उन्होंने अटल सरकार की कई योजनाओं को काफी गंभीरता से जारी किया है।  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय देश की सड़कों और नदियों को आपस में जोड़ने की मुहिम शुरू की गई थी। उसी मुहिम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगे बढ़ा रहे हैं। 3 अक्टूबर को उनके सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी आंध्र प्रदेश को सड़कों की सौगात देंगे। गडकरी लगभग 2000 करोड़ की लागत से बनी 415 किलोमीटर लंबी राष्ट्रीय राजमार्ग का उद्घाटन करेंगे। इसके साथ ही 25 सौ करोड़ से ऊपर की लागत वाली 250 किलोमीटर लंबी राजमार्ग परियोजनाओं का शिलान्यास करेंगे। धीरे-धीरे ही सही बिजली, पानी और डिजिटल क्रांति को लेकर देश में काम हो रहा है। नेहरू ने किस तरह के भारत का सपना देखा था और मोदी किस भारत का सपना देख रहे हैं। इसको समझने के लिए नरेंद्र मोदी को वक्त देना होगा। तभी ये संभव होगा कि नेहरू और मोदी के विजन में कितना अंतर है। कहना गलत नहीं होगा कि नेहरू के शासनकाल में विकास की जो आधारशिला रखी गई। उसके दम पर भारत ने 70 साल का लंबा सफर विकसित होने के लिए ही तय किया है। अब बारी मोदी की है जिन्हें अभी महज 5 साल तक राज करने का जनादेश मिला है। यदि यही जनादेश मोदी को आगे भी मिलता रहा तो फिर चर्चा होगी कि नेहरू और मोदी के बीच विकास की खूबसूरत तस्वीर किसने बनाई ?  

No comments:

Post a Comment