Wednesday, August 23, 2017

सुप्रीम कोर्ट में तलाकनामा

बड़ी मशक्कत से किसी का घर बसता है और तुम्हें शर्म नहीं आती किसी का घर उजाड़ने में। धन्यवाद सुप्रीम कोर्ट का, जिसने मुस्लिम महिलाओं की सुध ली है। मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है। अदालत ने सरकार को बकायदा कानून बनाने का निर्देश दिया है कि वो ऐसा कानून बनाए जिससे मुस्लिम महिलाओं को उनका वाजिब हक मिल सके। सुप्रीम कोर्ट का फैसला तारीफ के काबिल है।  11 मई से लेकर  18 मई तक सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक को लेकर लगातार सुनवाई हुई। 18 मई को अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने 22 अगस्त को अपना जजमेंट सुनाया। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला दिया। इस संविधान पीठ  में अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक रखने वाले जज शामिल थे। पांच जजों की पीठ में से तीन जजों ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। वहीं दो जजों ने सरकार को इस मुद्दे पर कानून बनाने को कहा। संविधान पीठ में चीफ जस्टिस जे एस खेहर सिख हैं। जस्टिस कुरियन जोसेफ ईसाई हैं। जस्टिस आ एफ नरीमन पारसी हैं। वहीं जस्टिस यू यू ललित हिंदू हैं जबकि जस्टिस अब्दुल नजीर मुस्लिम हैं। जाहिर है इस पीठ के फैसले पर सवाल उठाने का मौका किसी को भी नहीं मिलेगा। पीठ का गठन संतुलित है। तीन तलाक पर अदालत का जजमेंट भी न्यायसंगत है। इस फैसले के बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि न्यायपालिका ने अपना काम कर दिया। अब तीन तलाक का मसला विधायिका के पाले में आ गई है। उम्मीद है कि विधायिका मुस्लिम महिलाओं को सशक्त बनाने पर जोर देगी। जिससे मुस्लिम महिलाएं मान-सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन गुजार सके। न्यायालय के इस फैसले के बाद विधायिका और सरकार पर बड़ी जिम्मेदारी आ गई है कि उन्हें मुस्लिम महिलाओं का अधिकार दिलाना होगा। ऐसा कानून बनाना होगा जिससे मुस्लिम महिलाओं को ये महसूस हो कि समाज में उनकी अपनी अलग पहचान और अहमियत है, जो पुरुष प्रधान समाज में अब तक नहीं मिली है।

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