Thursday, July 13, 2017

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की उलझन !

मिशन 2018 में किला फतह करने के लिए मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों दल तैयारियों में जुट गए हैं। लेकिन कांग्रेस में दिक्कत ये है कि इसके दिग्गज नेता कई गुटों में बंटे हैं। जिसका खामियाजा कांग्रेस को पिछले कई चुनाव में पराजय के रूप में झेलना पड़ा है।हालांकि इस बार कांग्रेस अपने नेताओं को एकजुट करने की कोशिश कर रही है
 प्रदेश में दस दिवसीय किसान आंदोलन ने जो कोहराम मचाया,  उससे प्रभावित जनता कभी भूल नहीं पाएगी। 14 सालों का वनवास काट रही कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए मानो गोल्डन चांस मिल गया है। सवाल उठता है कि जो पार्टी राज्य में अपना चेहरा नहीं तय कर पा रही है, वो कैसे दावा करेगी कि इस बार वो जीत का परचम लहरायेगी। भाजपा की राजनीति पर गौर करें तो एक ओर मोदी लहर है तो दूसरी ओर शिवराज लहर। दोनों लहर अपने-अपने चेहरे के साथ हैं। कांग्रेस के लिए ये बड़ा सवाल है कि मध्य प्रदेश में उसके पास बड़े और लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन उनका सही इस्तेमाल पार्टी नहीं कर पा रही है। कमल का मुकाबला कमलनाथ बखूबी कर सकते हैं, लेकिन उनको छिंदवाड़ा से आगे बढ़ने नहीं दिया जा रहा है।कुछ यही हाल ज्योतिरादित्य सिंधिया का है। जो गुना तक ही सिमट कर रह गए हैं। बयानवीर दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के विधानसभा की चुनावी राजनीति के फ्रेम में कहीं नहीं हैं वहीं उनके बेटे जयवर्धन सिंह अभी राजनीति का क ख ग सीख रहे हैं। ऐसे में उन पर चर्चा का कोई नतीजा नहीं निकलेगा। इसके अलावा सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया, अरुण यादव और अजय सिंह समेत ऐसे कई कांग्रेसी नेता हैं जो प्रदेश में जीत का माद्दा रखते हैं, लेकिन हाईकमान है कि इसको लेकर कोई फैसला नहीं ले पा रहा है। युवा से लेकर अनुभवी तक कई नेता हैं, लेकिन आलाकमान की उलझन के चलते प्रदेश में कांग्रेस बिखरी-बिखरी नजर आ रही है। आलाकमान प्रदेश की राजनीति को सही तरीके से समझ नहीं पा रहा है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश में उलझा कांग्रेस का गणित सुलझने का नाम नहीं ले रहा है।

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